सांवर दइया की कविताएं


१. जब देखता हूं

जब देखता हूं

धरती को
इसी तरह रौंदी-कुचली
देखता हूं
जव देखता हूं आकाश को
इसी तरह अकड़े-ऎंठे
देखता हूं
अब मैं
किस-किस से कहता फिरूं
आपना दुख -
यह धरती : मेरी मां !
यह आकाश : मेरा पिता !


२. तुम्हारी गोद में

घुंडियों के मुंह लगाते ही
लगा मुझे
सारा सुख यहीं है
उमस
आंधी
और लू के थपेड़े
या ओलावृष्टि की मार
कुछ नहीं कर सकती मेरा
तुम्हारी गोद मे‍ मुझे डर कैसा
मैं चूंध तृप्त होता हूं
चूंध तृप्त होता है जगत
तुम्हारी छातियों में
क्षीर सागर है मां !


३. बीजूका : एक अनुभूति

सिर नहीं
है सिर की जगह
औंधी रखी हंडिया
देह -
लाठी का टुकड़ा
हाथों की जगह पतले डंडे
वस्त्र नहीं है ख़ाकी
फिर भी
क्या मजाल किसी की
एक पत्ता भी चर ले कोई
तुम्हारे होते !

अनुवाद : नीरज दइया



४. हत्भाग्य

गूंगा गुड़ के गीत गा रहा है
बहरा सराह रहा है
सजी सभा में
पंगुल पांव सहला कर बोला -
मैं नाचूंगा ।
अंधा आगे आया
कड़क कर बोला -
तुमने ठेका ले रक्खा है
मुझे भी तो देखने दो !
कलाकार !
लो, संभालो तुम्हारी कलम !


५. छल

लोग कहते हैं
तू जिन्हें दांत देता है
उन्हें चने नहीं देता
और जिन्हें चने देता है -
उन्हें दांत !
पर मुझे तो तूने
दोनों ही दिए, दांत और चने ।
दीगर है यह बात
कि इन दांतों से
ये चने चबाए नहीं जाते ।


६. आग में

आकाश में
गिद्धों की तरह तिर रहे हैं
हवाई जहाज-हैलीकॉप्टर
आग में ओटी हुई बाटी
उथलना भूल जाती हैं
चूल्हे के पास बैठी हुई औरतें
धमाके......धमाके.......धमाके
अब बाटी उथलने से क्या होगा ?
अब तो
सब कुछ आग में ही है !


७. सब से पहले

वे समझाते हैं
लड़ो
लड़ना धर्म है
पृथ्वी और मनुष्य को
बचाने के लिए लड़ो ।
सब से पहले
रौंदी जाती है पृथ्वी
मारा जाता है मनुष्य ।


८. अभ्यास

कंपकंपाती हुई अभागिन ठंड में
वे आते हैं
युद्धाभ्यास के लिए ।
सारी-सारी रात होते हैं
धोरों में धमाके
कांपती है रेत ।
सहमी-सहमी औरतें
क्या होगा की चिंता में मर्द
धक्‍-धक्‍ करती छात ।
चिल्ला कर जागते हैं
घरों में बच्चे
संभालती है और डराती है
राजा बेटे का बिछोना
पेशाब से तर ।


९. प्रार्थना

आकाश के अनंत छोर तक पहुंच
बच्चों के लिए चुग्गा जुटा कर
सांझ समय वापिस पहुंच सकूं
अपने घोंसले में
वे पंख देना मुझे ।

युगों से अंधकार में गुम
सुखों को शोध सकूं
भावी पीढ़ियों के लिए
वह आंख देना मुझे

अन्यथा ओ ईश्वर !
कृपा के नाम पर
कृपया
कोई कृपा मत करना मुझ पर

अनुवाद : मोहन आलोक


१०. उल्टे हुए पड़े को देख कर

मेरी जड़ें
जमीन में कितनी गहरी हैं
यह सोचने वाला पेड़
आंधी के थपेड़ों से
उलट गया जमीन पर
कितने दिन रहेगा
तना हुआ मेरा पेड़-रूपी बदन ?

रोज चलती है
यहां अभावों की आंधी
धीरे-धीरे काटता है
जड़ों को जीवन

अब
यह गर्व फिजूल
मेरी जड़े
जमीन में कितनी गहरी हैं ?

अनुवाद : नीरज दइया

1 टिप्पणियाँ:

दीनदयाल शर्मा ने कहा…

कवितायेँ मन को छु गई...

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